Skip to content

Real Autobiography of Pandit Ramprasad Bismil

Rs. 125.00

मेरी कुमारावस्था

जब मैं उर्दू का चौथा दर्जा पास करके पांचवें में आया उस समय मेरी अवस्था लगभग चौदह वर्ष कि होगी | इसी बीच मुझे पिताजी के सन्दुक के रूपये-पैसे चुराने की आदत पड़ गई थी | इन पैसों से उपन्यास खरीदकर खूब पढ़ता | पुस्तक-विक्रेता महाशय पिताजी के जान-पहचान के थे | उन्होने पिताजी से मेरी शिकायत की | आब मेरी कुछ जाँच होने लगी | मैंने उन महाशय के यहाँ से किताबें खरीदना ही छोड़ दिया | मुझे में दो-एक खराब आदतें भी पड़ गईं | मैं सिगरेट भी पीने लगा | कभी-कभी भंग भी जमा लेता था | कुमारावस्था में स्वतंत्रतापूर्वक पैसा हाथ आ जाने से और उर्दू के प्रेम-रसपूर्ण उपन्यासों तथा गजलों कि पुस्तकों ने आचरण पर भी अपना कुप्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया | घुन लगना आरम्भ हुआ ही था कि परमात्मा ने बड़ी सहता कि | मैं एक रोज भंग पीकर पिताजी कि सन्दूकची में से रुपए निकालने गया | नशे कि हाल्ट में होश ठीक न रहने के कारण सन्दूकची खटक गई | माताजी को सन्देह हुआ | उन्होने मुझे पकड़ लिया | चाभी पकड़ी गई | मेरे सन्दुक कि तलाशी ली गई | बहुत से रूपये निकले और सारा भेद खुल गया | मेरी किताबों में अनेक उपन्यासादी पाए गए जो उसी समय फाड़ डाले गए |

परमात्मा कि कृपा से मेरी चोरी पकड़ ली गई नहीं तो दो-चार वर्ष में न दीन का रहता और न दुनिया का | इसके बाद भी मैंने बहुत घातें लगाई, किन्तु पिताजी ने सन्दूकची का ताला बदल दिया था | मेरी कोई चल न चल सकी | अब तक कभी मौका मिल जाता तो माताजी के रुपयों पर हाथ फेर देता था | इसी प्रकार कि कुटेवों के कारण दो बार उर्दू मिडिल कि परीक्षा में उतीर्ण न हो सका, तब मैंने अंग्रेजी पढ़ने की इच्छा प्रकट की | पिताजी मुझे अंग्रेजी पढ़ाना न चाहते थे और किसी व्यवसाय में लगाना चाहते थे, किन्तु माताजी की कृपा से मैं अंग्रेजी पढ़ने भेजा गया | दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में फेल हुआ उसी समय पड़ौस के देव-मन्दिर में, जिसकी दिवार मेरे मकान से मिली थी, एक पुजारी जी आ गए | वह बड़े ही सच्चरित्र व्यक्ति थे | मैं उनके पास उठने बैठने लगा |

मैं मन्दिर में आने-जाने लगा | कुछ पूजा-पाठ भी सीखने लगा | पुराजी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ | मैं अपना अधिकतर समय स्तुतिपूजन तथा पढ़ने में व्यतीत करने लगा | पुजारीजी मुझे ब्रह्मचर्य पालन का खूब उपदेश देते थे | वे मेरे पथ-प्रदर्शक बने | मैंने एक दूसरे सज्जन की देखा-देखी व्यायाम करना भी आरम्भ कर दिया | अब तो मुझे भक्ति मार्ग में कुछ आनन्द प्राप्त होने लगा और चार-पाँच महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगा | मेरी सब बुरी आदतें और कुभावनाएँ जाती रहीं | स्कूलों की छुट्टियाँ समाप्त होने पर मैंने मिशन स्कूल में अंग्रेजी के पाँचवें दर्जे में नाम लिखा लिया | इस समय तक मेरी और सब कुटेवें तो छूत गई थीं, किन्तु सिगरेट पीना न छूटता था | मैं सिगरेट बहुत पिता था | एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था | मुझे बड़ा दुःख होता था कि मैं इस जीवन में सिगरेट पिने की कुटेव को न छोड़ सकूँगा | स्कूल में भर्ती होने के थोड़े दिनों बाद ही एक सहपाठी श्रीयुत सुशीलचन्द सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया | उन्हीं की दया के कारण मेरा सिगरेट पीना भी छूट गया |

देव-मन्दिर में स्तुति-पूजा करने की प्रवृति को देखकर श्रीयुत मुंशी इन्द्रजीत जी ने मुझे संध्या करने का उपदेश दिया | मुंशीजी उसी मन्दिर में रहने वाले किसी महाशय के पास आया करते थे | व्यायामादी के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगठित हो गया था और रंग निखर आया था | इसके बाद मैंने सत्यार्थप्रकाश पढ़ा | इससे तख्ता ही पलट गया | सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास में एक नवीन पृष्ठ खोल दिया | मैंने उस्मने उल्लिखित ब्रह्मचर्य के कठिन नियमों का पालन करना आरम्भ कर दिया | मैं कम्बल को तख्त्पर बिछाकर सोता और प्रात: काल चार बजे से ही शैया-त्याग कर देता | स्नान संध्यादि से निवृत हो कर व्यायाम करता, परन्तु मन की वृतियां ठीक न होतीं | मैंने रात्री के समय भोजन त्याग दिया | केवल थोड़ा सा दूधही रात को पीने लगा | सहसा ही बुरी आदतों को छोड़ा था, इस कारण कभी-कभी स्वप्नदोष हो जाता | तब किसी सज्जन के कहने से मैंने नमक खाना भी छोड़ दिया | केवल उबालकर साग या दाल से एक समय भोजन करता | मिर्च-खटाई तो छूता भी न था | इस प्रकार पाँच वर्ष तक बराबर नमक न खाया | नमक न खाने से शारीर के दोष दूर हो गए और मेरा स्वास्थ्य दर्शनीय हो गया | सब लोग मेरे स्वास्थ्य को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते थे |

मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्य-समाजी हो गया | आर्य-समाज के अधिवेशन में जाता-आता | सन्यासी-महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से सुनता | जबा कोई सन्यासी आर्य-समाज में आता तो हर प्रकार से सेवा करता, क्योंकि मेरी प्राणायाम सीखने की बड़ी उत्कट इच्छा थी | जिस सन्यासी का सुनता, शहर से तीन-चार मिल उसकी सेवा के लिए जाता, फिर वह सन्यासी चाहे जिस मत का अनुयायी होता | जब मैं अंग्रेजी के सातवें दर्जे में था तब सनातनधर्मी पंडित जगतप्रसाद जी शाहजहाँ पधारे उन्होंने आर्य-समाज का खण्डन करना प्रारम्भ किया | आर्य-समाजियों ने भी उनका विरोध किया और पंडित अखिलानंदजी को बुलाकर शास्त्रार्थ कराया | शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ | जनता पर अच्छा प्रभाव हुआ | मेरे कामों को देखकर मुहल्ले वालों ने पिताजी से मेरी शिकायत की | पिताजी ने मुझसे कहा कि आर्य-समाजी हार गए, अब तुम आर्य-समाज से त्यागपत्र ने देगा तो घर छोड़ दे | मैंने भी विचारा कि पिताजी का क्रोध अधिक बढ़ गया और उन्होंने मुझ पर कोई वस्तु ऐसी दे पटकी कि जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा | अतएव घर त्याग देना ही उचित है | मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा था और पाजामा उतार कर धोती पहन रहा था | पाजामे के निचे लंगोट बंधा था | पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा- ‘घर से निकल’ | मुझे भी क्रोध आ गया | मैं पिताजी के पैर छूकर गृह त्यागकर चला गया | कहाँ जाऊं कुछ समझ में न आया | शहर में किसी से जान-पहचान न थी कि कहाँ छिपा रहता | मैं जंगल की ओर भाग गया | एक रात और एक दिन बाग़ में पेड़ पर बैठा रहा | भूख लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़ कर खाए, नदी में स्नान किया और जलपान किया | दूसरे दिन संध्या समय पंडित अखिलानंदजी का व्याख्यान आर्य-समाज मन्दिर में था | मैं आर्य-समाज मन्दिर में गया | एक पेड़ के नीचे एकान्त में खड़ा व्याख्यान सुन रहा था कि पिताजी दो मनुष्यों को लिए हुए आ पहुँचे और मैं पकड़ लिया गया | वह उसी समय के हैड-मास्टर के पास ले गए | हैड-मास्टर साहब ईसाई थे | मैंने उन्हें सब वृत्तांत कह सुनाया | उन्होंने पिताजी जो समझाया कि समझदार लड़के को मारना-पीटना ठीक नहीं | मुझे भी बहुत कुछ उपदेश दिया | उस दिन से पताजी ने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया, क्योंकि मेरे घर से निकल जाने पर घर में बड़ा क्षोभ रहा | एक रात एक दिन किसी ने भोजन नहीं किया, सब बड़े दुखी हुए कि अकेला पुत्र न जाने नदी में डूब गया, रेल से कट गया ! पिताजी के ह्रदय को भी बड़ा भारी धक्का पहुँचा | उस दिन से वह मेरी प्रत्येक बात सहन कर लेते थे, अधिक विरोध न करते थे | मैं पढ़ने में बड़ा प्रयत्न करता था और अपने दर्जे में प्रथम उत्तीर्ण होता था | यह अवस्था आठवें दर्जे तक रही | जब मैं आठवें दर्जें में था, उसी समय स्वामी सोमदेव जी सरस्वती आर्य-समाज शाहजहाँपुर में पधारे | उनके व्याख्यानों का जनता पर बड़ा अच्छा प्रभाव हुआ | कुछ सज्जनों के अनुरोध से स्वामी जी कुछ दिनों के लिए शाहजहाँपुर आर्य-समाज मन्दिर में ठहर गए | स्वामी जी की तबीयत भी कुछ ख़राब थी, इस कारण शाहजहाँपुर का जलवायु लाभदायक देखकर वहां ठहरे थे | मैं उनके पास आया-जाया करता था | प्राणपण से मैंने स्वामीजी महाराज की सेवा की और इसी सेवा के परिणामस्वरूप मेरे जीवन में नवीन परिवर्तन हो गए | मैं रात को दो-तीन बजे तक और दिन-भर उनकी सेवा-सुश्रुषा में उपस्थित रहता | अनेक प्रकार की औषधियों का प्रयोग किया | कतिपय सज्जनों ने बड़ी सहानुभूति दिखलाई, किन्तु रोग का शमन न हो सका | स्वामीजी मुझे अनके प्रकार के उपदेश दिया करते थे | उन उपदेशों को मैं श्रवण कर कार्य-रूप में परिणत करने का पूरा प्रयत्न करता | वास्तव में वह मेरे गुरुदेव तथा पथ-प्रदर्शक थे | उनकी शिक्षाओं ने ही मेरे जीवन में आत्मिक बल का संचार किया जिनके सम्बन्ध में मैं पृथक वर्णन करूँगा |

कुछ नवयुवकों ने मिलकर आर्य-समाज मन्दिर एन आर्य कुमार सभा खोली थी, जिनके साप्ताहिक अधिवेशन प्रत्येक शुक्रवार को हुआ करते थे | वहीँ पर धार्मिक पुस्तकों का पाठन, विषय विशेष पर निबन्ध-लेखन और पाठन तथा वाद-विवाद होता था | कुमार-सभा से ही मैंने जनता को सम्मुख बोलने का अभ्यास किया | बहुधा कुमार-सभा के नवयुवक मिलकर शहर के मेलों में प्रचारार्थ जाया करते थे | बाजारों में व्याख्यान देकर आर्य-समाज के सिद्धान्तों का प्रचार करते थे | ऐसा करते-करते मुसलमानों से बुबाहसा होने लगा | अतएव पुलिस ने झगड़े का भय देखकर बाजारों में व्याख्यान देना बन्द करवा दिया | आर्य-समाज के सदस्यों ने कुमार-सभा के प्रयत्न को देखकर उस पर अपना शासन ज़माना चाहा, किन्तु कुमार किसी का अनुचित शासन कब मानने वाले थे ! आर्यसमाज के मन्दिर में ताला डाल दिया गया कि कुमार-सभा वाले आर्यसमाज मन्दिर में अधिवेशन न करें | यह भी कहा गया कि यदि वे वहाँ अधिवेशन करेंगे, तो पुलिस को बुलाकर उन्हें मन्दिर से निकलवा दिया जाएगा | कई महीनों तक हम लोग मैदान में अपनी सभा में अधिवेशन करते रहे, किन्तु बालक ही तो थे, कब तक इस प्रकार कार्य चला सकते थे ? कुमार-सभा टूट गई | तब आर्य-समाजियों को शान्ति हुई | कुमार सभा ने अपने शहर में तो पाया ही था | जब लखनऊ में कांग्रेस हुई तो भारतवर्षीय कुमार सम्मेलन का भी वार्षिक अधिवेशन वहां हुआ | उस अवसर पर सबसे अधिक पारितोषिक लौहार और शाहजहाँपुर की कुमार सभाओं ने पाए थे, जिनकी प्रशंसा समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई थी | उन्हीं दिनों मिशन स्कूल के एक विद्यार्थी से मेरा परिचय हुआ | वह कभी-कभी कुमार सभा में आ जाया करते थे | मेरे भाषण का उन पर अधिक प्रभाव हुआ | वैसे तो वह मेरे मकान के निकट ही रहते थे, किन्तु आपस में कोई मेल न था | बैठने उठने से आपस में प्रेम बढ़ गया | वह एक ग्राम के निवासी थे | जिस ग्राम में उनका घर था वह ग्राम बड़ा प्रसिद्ध है | बहुत से लोगों के यहाँ बन्दूक तथा तमंचे भी रहते हैं, जो ग्राम में ही बन जाते है | ये सब टोपीदार होते हैं, उन महाशय के पास भी एक नाली का छोटा-सा पिस्तौल था जिसे वह अपने साथ शहर में रखते थे | जब मुझसे अधिक प्रेम बढ़ा तो उन्होंने वह पिस्तौल मुझे रखने के लिए दिया | इस प्रकार के हथियार रखने की मेरी उत्कट इच्छा थी, क्योंकि मेरे पिता के कई शत्रु थे, जिन्होंने अकारण ही पिताजी पर लाठियों का प्रहार किया था | मैं चाहता था कि यदि पिस्तौल मिल जाए तो मैं पिताजी के शत्रुओं को मार डालूं ! यह एक नाली का पिस्तौल वह महाशय अपने पास रखते तो थे, किन्तु उसको चलाकर न देखा था | मैंने उसे चलाकर देखा तो वह नितान्त बेकार सिद्ध हुआ | मैंने उसे ले जाकर एक कोने में डाल दिया | उस महाशय से स्नेह इतना बढ़ गया कि सायंकाल को मैं अपने घर से खीर की थाली ले जाकर उनके साथ-साथ उनके मकान पर ही भोजन किया करता था | वह मेरे साथ स्वामी सोमदेव जी के पास भी जाया करते थे | उनके  पिता जब शहर आए तो उनको यह बड़ा बुरा मालूम हुआ | उन्होंने मुझसे अपने लड़के के पास ने आने या उसे कहीं साथ ने ले जाने लिए बहुत ताड़ना की और कहा कि यदि मैं उनका कहना न मानूँगा तो वह ग्राम से आदमी लाकर मुझे पिटवाएंगे | मैंने उनके पास आना-जाना त्याग दिया, किन्तु व महाशय मेरे यहाँ आते-जाते रहे |

लगभग अठारह वर्ष की उम्र तक मैं रेल पर चढ़ा था | मैं इतना दृढ़ सत्यवक्ता हो गया था कि एक समय रेल पर चढ़कर तीसरे दर्जे का टिकट ख़रीदा था, इस इण्टर क्लास में बैठकर दूसरों के साथ-साथ चला गया | इस बात से मुझे बड़ा खेद हुआ | मैंने अपने साथियों से अनुरोध किया कि यह तो एक प्रकार की चोरी है | सबको मिलकर इण्टर क्लास का भाड़ा स्टेशन मास्टर को देना चाहिए | एक समय मेरे पिता जी जवानी में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझ से करा लें | कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामें पर कर दूँ | मैंने तुरन्त उत्तर दिया कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता | वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि एक सौ रूपए से अधिक का दावा है, मुदकमा ख़ारिज हो जाएगा | किन्तु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए | अपने जीवन में सर्व प्रकार से सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था |

मेरी माता मेरे धर्म-कार्यों में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थीं | वह प्रात:काल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं | मैं नित्य-प्रति नियमपूर्वक हवन किया करता था | मेरी छोटी बहन का विवाह करने के निमित्त माता जी और पिताजी ग्वालीयर गए | मैं और श्री दादाजी शाहजहाँपुर में ही रह गए, क्योंकि मेरी वार्षिक परीक्षा थी | परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहन के विवाह में सम्मिलित होने को गया | बारात आ चुकी थी | मुझे ग्राम के बाहर ही मालूम हो गया था कि बारात में वेश्या आई है | मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ | मैंने विवाह में कोई भी भाग न लिया | मैंने माताजी से थोड़े से रुपयें मांगे | माताजी ने मुझे लगभग 125 रूपए दिए, जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया | यह अवसर रिवाल्वर खरीदने का अच्छा हाथ लगा | मैंने सुना था कि रियासत में बड़ी आसानी से हथियार मिल जाते हैं | बड़ी खोज की | टोपीदार बन्दूक तथा पिस्तौल तो मिले थे, किन्तु कारतूसी हथियार का कहीं पता नहीं लगा | पता लगा तो एक महाशय ने मुझे ठग लिया और 75 रुपये में टोपीदार पांच फायर करने वाला रिवाल्वर दिया | रियासत की बनी हुई बारूद और थोड़ी से टोपियाँ दे दीं | मैं इसी को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ | सीधा शाहजहाँपुर पहुँचा | रिवाल्वर को भर कर चलाया तो गोली केवल पन्द्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न थी | मुझे बड़ा खेद हुआ | माताजी भी जब लौटकर शाहजहाँपुर आई, तो पूछा क्या लाये ? मैंने कुछ कहकार टाल दिया | रुपये सब खर्च हो गए | शायद एक गिन्नी बची थी, सो मैंने माताजी को लौटा दी | मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती तो मैं माजी से कहता और मेरी मांग पूरी कर देती थीं | मेरा स्कूल घर से एक मील दूर था | मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मुझे साईकल ले दें | उन्होंने लगभग एक सौ रूपये दिए | मैंने साईकल खरीद ली | उस समय मैं अंग्रेजी के नवें दर्जे में आ गया था | कोई धार्मिक या देश सम्बन्धी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माताजी से ही दाम ले जाता | लखनऊ कांग्रेस जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी | दादी जी और पिताजी तो बहुत विरोध करते रहे, किन्तु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया | उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा समिति का आरंभ हुआ था | मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समीति में सहयोग देता था | पिताजी और दादाजी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे ने लगते थे, किन्तु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं | जिस के कारण उन्हें बहुधा पिताजी की डांट-फटकार तथा दण्ड भी सहना पड़ता था | वास्तव में, मेरी माताजी स्वर्गीय देवी हैं | मुझ में कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम हैं | दादाजी तथा पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा | माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यव्हार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता प्रदान की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा |

Customer Reviews

Based on 1 review Write a Review

Customer Reviews

Based on 1 review Write a Review
x