नासा – दुनिया की सबसे बड़ी चोर एजेंसी

नासा

विषय

  • भारत में विज्ञान था तो समाप्त कैसे हुआ?
  • उनके अवशेष उपलब्ध क्यों नहीं है ?
  • द्वितीय विश्वयुद्ध और जर्मनी
  • कैसे जर्मनी के दस्तावेज चुराकर नासा चाँद पर गयी?
  • जर्मनी में चोरों की टोलियां
  • 5156 वर्ष पूर्व रचा इतिहास
  • जर्मनी से विज्ञान पूरे विश्व मे फैला, तो वहां कैसे फैला ?
  • हिटलर का वह कथन जिसे सुनकर दुनिया दंग रह गयी
  • हिटलर और वेद

भारत में विज्ञान था तो समाप्त कैसे हुआ?

आज नासा जैसी कुछ एजेंसी विज्ञान के उन्नति में अपनी पीठ थपथपा रही है। दुनिया के देशों में होड़ लगी है कि यह विज्ञान हमने दिया वह विज्ञान हमने दिया। विज्ञान कभी भी हमारा तुम्हारा नहीं होता है किंतु सबके कल्याण के लिए होता है। जिसने भी संसार के उत्थान के लिए पुरुषार्थ किया उसकी जय जयकार होनी ही चाहिए। ये भी सच है कि बाद के काल में नासा व अन्य देशों के वैज्ञानिकों ने दिन-रात परिश्रम करके विद्याओं का विस्तार किया। जिसके लिए वे प्रशंसा के पात्र भी है। अस्तु , उत्थान के साथ पतन जुड़ा हुआ है। प्रयत्न और पुरुषार्थ जब होता है तो उन्नति होती है। उन्नति के समय अपार धन-सम्पदा, ताकत, मौज-मस्ती के साधन हो जाते है। फिर आलस्य और प्रमाद बढ़ जाने से अवनति होती है। जैसे महाभारत युद्ध के बाद यदुवंशियों, वृष्णिवंशियों, अन्धकवंशियों का आपसी झगडे में पतन हुआ। सभ्यताएँ बनती-बिगड़ती रहती है। व्यवस्थाएं बदलती रहती है। महाभारत युद्ध ने सारी दुनिया की व्यवस्थाओं को छिन्न भिन्न कर दिया था। पूरी दुनिया के विद्वान , शिल्पी युद्ध के कारण काल का ग्रास बन गये थे।

उनके अवशेष उपलब्ध क्यों नहीं है?

जो लोग यह प्रश्न पूछते है मेरा मानना है कि वे इन गूढ़ (गहरे) विषयों को समझने योग्य नहीं है। इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण केवल उन बिन्दुओं पर प्रकाश डालूँगा जो सामान्य बुद्धि के समझ में भी आ जायेंगे। अवशेष न मिलने के अनेकों कारण होते है :-

  • हजारों सालों में अनेकों पदार्थ क्षय (गल) को प्राप्त हो जाते है।
  • वंशज अपने पूर्वजों की चीजों का प्रयोग करते जाते है। आज भी पिता- दादा की वस्तुएं उनके बच्चे उपयोग करते है।
  • प्राकृतिक आपदाओं या गृहयुद्धों अथवा बाहरी आक्रान्ताओं के कारण भी सभ्यताएँ इतिहास से मिट जाती है।
  • ग्रंथो व साहित्य में स्वार्थी लोग देश- काल- परिस्थितियों में मिलावट करते जाते है और उनकी ऐतिहासिकता नष्ट हो जाती है।
  • इतिहास पर शोध करने वाले भी सभ्यताओं के अवशेष निकाल लेते है। फिर उनसे वो अपने अपने अनुसार लाभ लेने के लिए नई नई परिभाषाएं बनाते है और पूरा इतिहास विकृत हो जाता है। कुछ तो अलग अलग समय में वर्तमान राजाओं के दबाव में ऐसा होता है। इससे भी आने वाली पीढ़ियों को अवशेष प्राप्त नहीं होते है आदि अनेकों कारण है।

उदाहरण के तौर पर जब अंग्रेज भारत में रेलवे लाइन बिछा रहे थे तो हड़प्पा सभ्यता की ईंटों को उखाड़ उखाड़ कर रेलवे में लगा दिया गया। पाकिस्तान व भारत के जिन-जिन स्थलों पर हड़प्पा सभ्यता के बड़े बड़े मकान, तालाब आदि थे। उनकी ईंटों को लेकर लोगों ने अपने घर बना लिये। आज भी हड़प्पा के अनेकों अवशेष बचे है जिनको स्थानीय लोगों ने घेर रखा है। लगभग 2500-2000 ई.पू की महान सभ्यता के नामों निशान मिटाये जा रहे है। फिर 1000 साल बाद कि भावी पीढियां कहेंगी कि कोई हड़प्पा सभ्यता नहीं थी। क्योंकि उनके कोई अवशेष नहीं है।

अरे हम मरुस्थल में जिस स्थान पर से गुजर जाते है। यदि 1 घंटे बाद बाद आकर अपने पैरों के निशानों को खोजेंगे तो पैरों के निशान नहीं मिलेंगे। हम हजारों साल पहले की बात कर रहे है। फिर भी यह ऋषिभूमि है। महान भारतभूमि है। स्वर्णिम इतिहास के सैकड़ों प्रमाण तो मैं स्वयं Thanks Bharat YouTube Channel से अनेकों विडियो में दे चुका हूँ। और भविष्य में उनको कलमबद्ध अवश्य करूँगा ताकि आने वाली पीढियां गर्व करें। अब कोई यह प्रश्न खड़ा करता है तो समझ लीजिये वह किसी न किसी स्वार्थ, पूर्वाग्रह, हठ का शिकार है। अथवा किसी दुर्घटना के कारण उसका दिमाग ऐसे गहन विषयों को पकड़ने में असमर्थ है। या यूँ कहे कि वह किसी न किसी प्रकार के पागलपन का शिकार है।

द्वितीय विश्वयुद्ध और जर्मनी

युद्ध के समय विरोधी पक्ष का निशाना सेनापति, विद्वान , शिल्पी वैज्ञानिक ही होते है। जर्मन इंजीनियर वर्नहर वान ब्रान ने पेनमुंडे गांव को दुनिया की पहली मिसाइल बनाने के लिए चुना। 1936-43 तक 12 हजार लोगों के साथ वो इस मिशन पर लगे रहे। हिटलर ने इस मिशन पर खास ध्यान व पैसा लगाया (दूसरे विश्वयुद्ध के बावजूद सहयोगी वैज्ञानिक वाल्टर डार्नबर्गर का 1942 में लिखा अहम दस्तावेज आज भी उपलब्ध है जिसमें दुनिया के पहले राकेटर एग्रीगेट-4 (A.4 )के कामयाब परीक्षण का उल्लेख है । दुनिया के पहले लंबी दूरी तक मार करने वाले रॉकेट का नाम ‘वेंजियन्स वेपन’ या बदला लेने वाला हथियार था।

दूसरे विश्वयुद्ध में जब हिटलर इस हथियार का प्रयोग करने की तैयारी कर रहे थे। उसी दौरान ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसियों को पेनमुंडे के रॉकेट कारखाने की भनक लग गयी। 17 अगस्त 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स ने उस समय का सबसे बड़ा हमला पेनमुंडे पर किया। इसे ब्रिटेन ने ऑपरेशन ‘हाइड्रा’ नाम दिया था। हिटलर ने कारखाना बदलकर जर्मनी के बीचोबीच मिटेलवर्क में लगाया। जर्मनी की हार से ठीक पहले हालांकि अभी v1 और v2 राकेट का काम चल रहा था लेकिन फिर भी 2500 v1 और 1400 v2 राकेट ब्रिटेन पर छोड़े गये जिनमें लगभग 10000 लोग मारे गये। दुनिया के वैज्ञानिक व सैनिक ऐसी हवाई मशीनों से हुए हमलों को देखकर हक्के बक्के रह गये थे। (अमेरिका की नासा एक चोर एजेंसी है)

कैसे जर्मनी के दस्तावेज चुराकर नासा चाँद पर गयी?

चौतरफ़ा युद्धों से घिरा जर्मनी कारखाने बदलता रहा गया और मित्र देश दूसरा विश्वयुद्ध जीत गये। यदि 1-2 वर्ष का समय और नाजी लोगों को मिल जाता तो युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता। युद्ध के पश्चात अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस ने A4/v2 तकनीक हासिल करने के लिए जर्मनी वैज्ञानिकों और इंजिनियरों की तलाश शुरू कर दी। वान ब्रान के नेतृत्व में सभी इंजिनियर अलग अलग ग्रुपों में बंट गये। ताकि कोई एक ग्रुप मरे तो राकेट की तकनीक समाप्त न होवे। राकेट से सम्बंधित सभी डाक्यूमेंट्स और पूरी तकनीक को इन्होंने जर्मनी ऑस्ट्रिया के बॉर्डर पर पहाड़ों तथा गुफाओं में छुपा दिया।

अब ये इंजिनियर थोड़ा सुरक्षित थे। क्योंकि तकनीक नहीं मिलेगी तब तक कोई भी देश ऐसे होनहार व्यक्तियों को नहीं मारेगा। ऐसा ही हुआ। तकनीक के कुछ कुछ ब्लूप्रिंट सोवियत संघ ,ब्रिटेन व फ्रांस को भी मिले। इसीलिए ये देश फाइटर जहाजों व स्पेस एजेंसी के मामले में उन्नत है। सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को हुआ। मुख्य वैज्ञानिक बर्नहर वान ब्रान इनके हाथ लगा जिसको अमेरिका की नागरिकता दी गई। ब्रान ने लगभग 150 राकेट इंजिनियरों का पता बताकर उनको भी अमेरिका में लाने का महत्वपूर्ण काम किया था। 1958 में नासा की स्थापना के बाद इसी वैज्ञानिक ने नासा के प्रसिद्ध मिशन ‘अपोलो’ के लिए कार्य किया व अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद का सफर तय किया। इसी रिसर्च के आधार पर इंटरकांटिनेंटल मिसाइलें विकसित की गई। नासा की सफलता के पीछे जर्मन वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा हाथ है

जर्मनी में चोरों की टोलियाँ

सोवियत संघ (Soviet space program) ने जब सभी राकेट वैज्ञानिकों के अमेरिका होने की बात सुनी तो राकेट तकनीक प्राप्त करने के लिए उसने दिन-रात, आकाश-पाताल एक कर दिया। सोवियत संघ के वैज्ञानिक पेनमुंडे गाँव पहुंचे और किस्मत से Alexei Isaev को supersonic bomber rocket से सम्बंधित एक document मिला तथा v2 राकेट के बिखरे हुए कुछ हिस्से भी मिले। इतना ही नहीं एक v2 राकेट जो नाजियों ने पोलेंड में उतारा था उसको भी ढूंढ निकाला। और यही से शुरू हुई सोवियत संघ और अमेरिका की अन्तरिक्ष उड़ान। इतना ही नहीं Nuclear weapons की सोच भी हिटलर की ही थी और उसी के वैज्ञानिक सर्वप्रथम इस दिशा में कार्य कर रहे थे। 1944 में जर्मनी की हार के बाद राकेट तकनीक की भांति परमाणु तकनीक व वैज्ञानिक भी अमेरिका के हाथ लगे।

ये थी जर्मनी की ताकत और तकनीक जिसके पीछे हिटलर का समर्थन व प्रोत्साहन कार्य कर रहा था। जिस हिटलर को दुनिया मित्र देशों के दुष्प्रचार के कारण बुरा बताती है उसी हिटलर के बल पर आज की वैज्ञानिक दुनिया उछल कूद कर रही है। आधी दुनिया पर अत्याचार करने वाला ब्रिटेन अच्छा लेकिन हिटलर बुरा और जापान पर परमाणु बरसाने वाला अमेरिका अच्छा लेकिन हिटलर बुरा। जिस हिटलर ने भारत की शान सुभाष बोस का साथ दिया, जिस जापान ने सुभाष चंद्र बोस का साथ दिया उनको ही भारतवासी बुरा मानने लगे। क्योंकि ब्रिटेन के साथ इनकी दुश्मनी थी। ब्रिटेन हमारा भी दुश्मन था और दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। और हमने दोस्तों को गाँधी-नेहरु के बहकावे में आकर दुश्मन मान लिया। भारत की जनता तो है ही भोली-भाली। खैर, इस विषय पर फिर कभी आयेंगे।

A discovery by nuclear physicists in a laboratory in Berlin, Germany, in 1938 made the first atomic bomb possible, after Otto Hahn, Lise Meitner and Fritz Strassman discovered nuclear fission. When an atom of radioactive material splits into lighter atoms, there’s a sudden, powerful release of energy.

विशेष:- जिस खुफिया मिशन पर हिटलर काम कर रहा था उसमें ज्यादातर कारीगर व मजदूर यहूदी युद्धबंदी थे। 
       इसीलिए यहूदी लोगों में भी वह विद्या फ़ैल गयी और आज इजराइल ने बहुत वैज्ञानिक उन्नति की है।  

अमेरिका ने इन यहूदी कारीगरों को भी शरण दी। आज भी इजराइल के बाद सबसे ज्यादा यहूदी अमेरिका में है तथा अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को संचालित भी करते है। जिन यहूदियों के पास दुनिया में कोई जमीन का टुकड़ा नहीं था। अमेरिका पर पकड़ बनाकर अपने लिए नया देश ‘इजराइल’ बनवा लिया और तकनीक को उन्नत भी किया।

5156 वर्ष पूर्व महाभारत का इतिहास

इतिहास की इस रोचक व ज्ञानवर्धक सत्य घटना से एक बात स्पष्ट है कि दुसरे विश्वयुद्ध में तकनीक स्थानांतरण जर्मनी से मित्र देशों में हुआ। पेनमुंडे गांव में कारखाने के टूटे-फूटे अवशेष बिखरे पड़े है। कल्पना कीजिए कि यदि द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की तरह सभी सम्मलित देशों का विनाश हो जाता था बहुत बड़ा परमाणु युद्ध हो जाता तो सभी देशों के वैज्ञानिक व रिसर्च करने वाले स्थान, कारखाने सबसे पहले नष्ट होते और संसार पुनः अंधकार में चला जाता। ऐसा ही हुआ था आज से 5156 वर्ष पूर्व, जब महाभारत का युद्ध लड़ा गया जिसमें चीन का भगदत्त , पातालदेश (अमेरिका) का बब्रूवाहन, युरोपदेश (हरिवर्ष कहते थे – हरि संस्कृत में बन्दर को कहते है अर्थात बंदर जैसी आंखे वाले ) का विडालाक्ष, यूनान व ईरान का शल्य, कन्धार आदि अनेकों बड़ी ताकतों ने हिस्सा लिया था। महाभारत में अर्जुन का विवाह तो अमेरिका के राजा की कन्या ‘उलोपी’ से हुआ था।

दुर्भाग्य से उस युद्ध में महाविनाश हुआ। जो कुछ विद्वान शिल्पी बचे थे उनकी आयु तकनीक को दोबारा खड़ा करने के लिए साधन -संसाधन जुटाने में ही निकल गई। परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ियां अंधकार में चली गई।
साहित्य, ग्रंथ आदि सब नष्ट हो गया था। जो कुछ बचा था उसको समझाने व समझने वाला कोई बचा न था। बाद में विदेशी आक्रांताओं ने भी हमारी अमूल्य पुस्तकों व पुस्तकालयों को नष्ट किया। नालंदा के पुस्तकालय में जब मुसलमानों ने आग लगाई तो 6 माह तक धुआं उठता रहा इतना साहित्य बर्बाद हो गया। इतना होने पर भी मुख्य -मुख्य खोजें भारत के वैज्ञानिकों ने ही की, जिनको समय समय पर लाता रहूंगा।

जर्मनी के विज्ञान का मूल स्त्रोत

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मनी की वायुसेना के पास लगभग 2500 विमान थे। ब्रिटेन व फ्रांस मिलकर भी जर्मनी का मुकाबला नहीं के सकते थे। आखिर जर्मनी में पदार्थ विद्या की इस भौतिक उन्नति के पीछे कौन था? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं हिटलर अपनी आत्मकथा “मेरा संघर्ष” के पृष्ठ 232 में देते है।

“Every manifestation of human culture, every product of art, science and technical skill, which we see before our eyes two-day, is almost exclusively the product of the Aryan creative power. Aryan alone who founded a superior type of humanity. If we divide mankind into three categories – founders of culture, bearers of culture, and destroyers of culture – the Aryan alone can be considered as representing the first category.” On the next page he said that “the present Japanese development has been due to Aryan influence.” (I have this book in english)

हिटलर स्पष्ट कह रहा है कि जर्मनी, जापान व विश्व के सभी हिस्सों में जितना ज्ञान-विज्ञान तथा अच्छाई है वह आर्यों की ही देन है। हिटलर से लगभग 47 वर्ष पहले महर्षि दयानंद ने “सत्यार्थ प्रकाश” में जो लिखा था अक्षरशः वही हिटलर ने 47 साल बाद लिख दिया।

हिटलर और वेद

"अहम् भूमिमद्दाम आर्याय" - ऋग्वेद 4/26/2

ईश्वर वेद में कहता है कि मैं यह भूमि आर्यों को देता हूँ। आर्य कभी भी दस्युओं से हारकर कायरों की भांति छिपते न रहे यही ईश्वर का आदेश है। हिटलर ने यही कहा कि विश्व पर केवल आर्यों का कब्जा होना चाहिए और जर्मनी वाले सभी आर्य है। नाजी आर्य है। उसने हिन्दुओं के चिह्न “स्वस्तिक” को अपना ध्वज भी बनाया। हिटलर को चिंतन व स्वाध्याय का अधिक समय नहीं मिल पाया। वह एक नेता था। शोध का कार्य नेता नहीं कर पाता। इसी लिए हिटलर जितनी शोध कर पाया वह भी एक राजा के लिए बड़ी बात थी। मगर आर्य कौन है? यह खोज वह नहीं कर पाया। दुनिया के सभी प्राचीन ग्रंथों में आर्यों का वर्णन है। आर्य को सबसे उत्तम बताया गया है। आर्य संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “श्रेष्ठ”।

हिटलर से एक ही भूल हुई और वह थी आर्य को जन्म से मानने की। फिर भी यह स्पष्ट है और सारी दुनिया जानती है कि vedas are the foundation head of all art, science and technology. वैसे ऋषि दयानंद ने भी मनुस्मृति के श्लोक देकर आर्यों व दस्युओं की पहचान बताई है। हिटलर कुछ कुछ नजदीक पहुंच गए थे। लेकिन एक बड़ी भूल के कारण मूल विषय समझ नहीं सके। यह कोई बड़ी बात भी नहीं थी क्योंकि हिटलर को ज्यादा शोध का समय नहीं मिला व कुछ अंग्रेज इतिहासकारों की आर्य पर गलत व्याख्या भी इस भूल का कारण बनी। अस्तु, जर्मनी में आज भी संस्कृत का बोलबाला है। वहां की 14 यूनिवर्सिटीज में संस्कृत व वेदों का अध्ययन भी होता है। आज भी लाखों लोग वहां अपने को आर्यों की संतान मानते है।

मैं समझता हूं कि आज के बाद कोई यह नहीं कह सकता कि वर्तमान समय में आर्यों ने कौन सी वैज्ञानिक उपलब्धि दिलवाई। 21वीं सदी के इस विज्ञान का आधार आज भी आर्य ही है, पहले भी आर्य ही थे और आगे भी आर्य ही होंगे। आज आर्यों को हिन्दू कहा जाने लगा है। ईश्वर आज्ञा देता है कि

इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अपघ्ननन्तो अराव्णः – ऋग्वेद 9/63/5
हे मनुष्यों अपना ऐश्वर्य, धन, संपदा, बल बढ़ाओ, फिर पूरे संसार को आर्य (श्रेष्ठ) बनाओ, जो दुष्ट, राक्षस मार्ग में बाधा बने उनका सर्वनाश कर दो।

विज्ञान कभी भी हमारा तुम्हारा नहीं होता है किंतु सबके कल्याण के लिए होता है। लेकिन कुछ लोग अपनी छोटी व नीच सोच के कारण मजबूर कर देते है कि उनको कड़वी सच्चाई का दिग्दर्शन करवाया जाये। मेरा यह लेख सैकड़ों सवालों का अकेला व प्रमाणसिद्ध प्रभावी उत्तर है। आज के बाद कोई यह नहीं कह सकेगा कि नासा के आने के बाद विज्ञान ने गति पकड़ी। यह ज्ञान तो नासा की स्थापना के लाखों करोड़ो वर्ष पहले से ही आर्यों ने दे दिया था। आशा करता हूँ कि मनुष्य जाति को उन्नत व सभ्य बनाने हेतु सभी वेद व आर्यों के मानव कल्याण हेतु दिए आध्यात्मिक ज्ञान को भी अपनाएं। ईश्वर के सच्चे उपासक बन दया, करुणा, प्रेम, सौहार्द जैसे गुणों की वृद्धि करके मानवता को चहुं ओर फैला देवे।

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हवाई जहाजों का सम्पूर्ण इतिहास – यह खोजपूर्ण लेख अवश्य पढ़ें

इति हस्तलेखे
राहुलार्यः
पौष, शुक्ल त्रयोदशी,
2075 विक्रमाब्द ।।

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79 Comments

  1. भाई राहुल आर्य मै आपके साथ काम करना चाहता हूँ

    मै भी आपके blog से जुड़ना चाहता हूँ

    🙏

  2. सनातन वैदिक धर्म की जय आर्यों की जय थैंक्स युटुब भारत हमें अच्छे-अच्छे प्रेरणादायक बातें मिलती है ज्ञानवर्धक बातें मिलते हैं दर्शन होते हैं सत्य का दर्शन होता है

  3. Thank you rahul bhai is jankari ke liya. Me bhi hitler ko sirf bura aadmi hi samakta tha. Apki is jankari ko dekh kar bahut aacha laga. Bhai aise hi kaam karta rehna hum sab ko sach se अवग्ध karane ke liya.

  4. Rahul Aarya ji WHO WERE SHUDRAS helping me to stop anti Hindu propaganda among lower caste people and drive away Dalits from Hinduism. I have translated your speech into kannada and sent to many friends here. I request you not use harsh language on Dalits. You can explain
    1)what Ambedkar told on Pakistan and islam.
    2) Why he didn’t become Muslim offered by Nizam of Hyderabad.
    3)how Gandhi Nehru troubled Republic party of India of Ambedkar
    4) Congress is party of mohandas nehru. They tried to destroy Swami Shraddhanandji, Bhagat Singh trio, Sardar Patel, Subhas Bose.
    After independence their children destroyed Lalbahadur Shastri, PV Narasimha Rao, Manmohan Singh, Pranab Mukarji now whole country.
    5) What Ambedkar told on reservations. Only for 10yrs.
    6) Gandhi was pro Muslim anti Hindu coward refusing to act on protection of Hindus in Momphla Kerala, Bengal, Punjab.
    7) Ganfhi wanted to create roads from Pakistan to Bangladesh via rajasthan Madhya Pradesh Bengal.
    -Pakistan or Partition of India-refer this.

  5. I watched Aahwan on Swami Shraddhanandji on YouTube. I show DKC videos to my family friends. I am teacher. I was looking to establish a gurukula like that. Then i saw thanks Bharat Rahul Arya ji. From two months i watch DKC videos. Why its not going beyond 122? Rahul Arya is 1st daring Rational Hindu among common people. Please take care of your health and family. Jihadis r dangerous. We need people like you. Videos website r needof the hour.

    About this Peenamudee lab research, I was greatly transfromed by my History text book where a chapter – second world war printed by Karnataka secondary education board in 2002. How a German nation destroyed by French and British became most powerful in 14yrs was spectacular. Hitler was the 1st man who crushed communists through patriotism. His national socialist party was 7ppl when communist were already 6 million in 1920. But in 14 yrs Fuhrer eradicated German unemployment, hyper inflation, dirty Jewish pornography, and EVIL COMMUNISTS.

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